Friday, July 20, 2012

जीवन का नया अध्याय

आजकल  कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन के एक नए अध्याय में पहुँच गया हूँ,. एक कारण यह कि आजकल मैं दूसरों को सुधारने कि बजाय स्वयं सुधरने पर ध्यान दे रहा हूँ. अब लोगों और परिस्तिथियों को स्वीकारना  लगभग सीख ही लिया है. और 'सब ठीक है' के मन्त्र का भी प्रतिदिन मनन जारी है. 

फोटोग्राफी भी आजकल अपने iPhone को उपयोग कर बहुत तादात में हो रही है. उसके साथ साथ Facebook पर सबके साथ बांटना भी शुरू है. अपनी इन आदतों से स्वयं कुछ प्रसन्न भी हूँ.

जीवन ऐसे ही प्रतिदिन अपने सुधार की ओर अग्रसर रहे, और अपने अगले पड़ाव अध्यात्म में जा बसे, इसी कामना के साथ, आज बस. 

Friday, March 16, 2012

कौन हूँ मैं?

मैं कौन हूँ? या क्या हूँ? यह प्रश्न अनादि काल से मनुष्य को सताता रहा है, आज मुझे भी. हालांकि इस बारे में काफी पढ़ा है, विचारा है, चर्चाएँ की हैं, किन्तु न जाने फिर भी आजकल इस विषय पर बहुत उलझ रहा हूँ. क्या यह मेरी प्रोढ़ता है अथवा मूढ़ता, पता नहीं.

शायद अपनी जननी की व्याधि व उम्रजन्य व्यथाओं को स्वयं सहन कर सकने की असमर्थता हो, या महात्मा बुद्ध की तरह वृध्दावस्था और व्याधिग्रस्त पीडाओं को देख जीवन की यथार्थता का भान हो रहा हो.

क्या जीवन के कोई मायने नहीं? क्या जीव की कोई वस्तुता नहीं? क्या सही में हम अनादि अनंत से भटकते हुए एक चैतन्य हैं, जिसके कोई रूप, रस, गंध नहीं? क्या वस्तुतः 'हम' निराकार, निर्ग्रन्थ, निर्गुण, अरूपी, आत्मिक सत्य हैं, जिसका इस सांसारिकता से कोई भी वास्ता नहीं?

यह सभी प्रश्न अंतर्मन को झकझोर रहें हैं. मुझे अपने आप में लीन होने के लिए प्रेरित कर रहें हैं. संसार से विराग की ओर ले जा रहें हैं. किसे चुनूं? कैसे चुनूं? क्या निश्चय का मार्ग व्यवहार पर हावी हो जाए? क्या सांसारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके? अनेकानेक प्रश्न हैं, जटिल हैं. पर राह तो अति सरल और सहज प्रतीत होती है, उसका चुनाव करना बड़ा ही कठिन.

मन और इन्द्रियों को वश में कर आत्म साधना के द्वारा ही इस चुनाव को पूरा किया जा सके. आत्म साधना में लगने के मार्ग में प्रसश्त होना चाहिए...

Friday, September 9, 2011

उत्तम त्याग धर्म - पर्युषण का आँठवा दिन

आज पर्युषण का आँठवा दिन है, उत्तम त्याग धर्म का दिन. अभी तक के व्रत बहुत ही आनंद पूर्वक जा रहे हैं. शुभ्रा ने पूरे दसों दिन के उपवास करने का निर्णय लिया है और अब तक उसके आठों दिन सातापूर्वक बीते. मेरी बेटी आयामी भी अब तक ३ दिन के उपवास कर चुकी है. उसे यह भावना स्वयं ही आई कि उसने भी व्रत करने चाहिए. जबकि वह अपने कॉलेज के लिए लगभग ३-४ मील रोज़ ही चलती है और अपने अपार्टमेन्ट में रहती है.

इनकी देखा सीखी मैं भी एकासन कर रहा हूँ, लेकिन diabetes के कारण सुबह शाम पानी के समय काजू किसमिस खा लेता हूँ. बेटा आगम डोर्म में होने से और AF-ROTC की कठिन PT के कारण कुछ भी व्रत नहीं कर पा रहा है. 

शिकागो जैन मंदिर में इस बार श्रुत प्रज्ञा स्वामीजी आने से प्रवचन का आनंद और धर्म लाभ भी पूरा पूरा हो रहा है. 

व्यवसाय भी अपनी गति से शुरू है और अपने आत्मविश्वास व सिद्धांतों पर भरोसा करके जुटे हुए हैं. आज ही कुछ अच्छी सूचनाएं आयीं और अब लगता है कि इतने पूरे सालों की मेहनत के परिणाम अब इकट्ठे मिल जायेंगें. इसी परम विश्वास के साथ आज बस इतना ही. 

Friday, September 2, 2011

उत्तम क्षमा - दस लक्षणधर्म पर्व का पहला दिन

आज उत्तम क्षमा का दिन है - दस लक्षणधर्म पर्व का यह पहला दिन हमें याद दिलाता है कि हमने हमारे ह्रदय में हमेशा क्षमा भाव रखना चाहिए. अगर मन में, विचारों में और दिल में क्षमा भाव हों तो हमें क्रोध नहीं आएगा. हम हमारे सारे काम शांतिपूर्ण करेंगे और उनमें सफलता प्राप्त करेंगे.

क्षमा अहिंसा पालन करने का मूलभूत कारण है क्षमा बिना हम अहिंसा नहीं कर सकते.

सभी लोगों को दस लक्षण महा पर्व की बधाईयाँ और सभी धर्मों को पालन कर सकने के लिए शुभ कामनाएं. 


Tuesday, June 14, 2011

India trips

Just completed 2 India trips. First from April 16th till May 8th and second from May 30th till June 12th. Both were business trips mixed with personal visits to mother and other relatives. 

Thursday, November 11, 2010

पितृत्व भावनाएं

भावनाएं क्या स्त्रीओं को ही होती हैं? क्या पुरुष भावनाशुन्य हैं? या फिर सामाजिक व सांस्कृतिक औपचारिकताओं के वशीभूत पुरुषों को भावनाएं दर्शाना अनुचित है? और अगर नहीं, तो सारा साहित्य तथा अन्य सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ क्यों पौरुषिक भावनाओं से रिक्त हैं? मैं यहाँ पर कोमल भावनाओं कि बात कर रहा हूँ, न कि रौद्र रूपों की. 

कई दिनों से बहुत भावुक हो रहा हूँ चाहे हर्षोल्लास हो, श्रृंगार हो, प्रेम हो या आर्त्र-रौद्र भाव हों. लेकिन उतना ही इन भावों को सुसुप्त रखना, उन्हें व्यक्त न करना या कर पाने का साहस न जुटा पाने से अंतर्मन कुछ उलझा एवं व्यथित है. और शायद ऐसे ही  समय मनुष्य कुछ लेखन कर पाता है. 

पैत्रिक भावनाएं कुछ ज्यादह ही जोर मार रहीं हैं और मैं फिर कभी कभी बच्चों की शैक्षिक कमजोरियों के लिए अपने को दोषी ठहराता हूँ. पुत्री तो कॉलेज चली ही गयी है और पुत्र भी कॉलेज जाने की याचिकाओं में लगा है. और अब वो बड़े हो जाने से अपनी अपनी जिंदगी जी रहे हैं, जिनमें माता-पिता के लिए जगह की कमी है. खासकर पुत्र अपनी निजी जिंदगी की इतनी कम बातें करता है की लगता है वो अभी से दूर हो गया हो. 

मुझमें शायद मोह अधिक होने से दुःख भी अधिक पाता हूँ. पितृत्व भावनाएं आजकल कुछ ज्यादह ही जोर मार रहीं हैं, और मेरे मन को झकझोर रहीं हैं. साहस व धैर्य से इनको शांत रखकर जीवन पथ पर निरंतर बढ़ने के कामना के साथ लगा हुआ हूँ. 

लगे रहो, पप्पू भाई..... 

Tuesday, November 9, 2010

विरह की वेदना

विरह की वेदना के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है, किन्तु शेष सभी सत्तात्मक अनुभुतीओं की तरह इसे भी तभी समझा जाया जाता है, जब तक स्वयं विरह की वेदना न सहें.

कुछ दिनों पहले पत्नी भारत यात्रा पर गयी और मैं लगभग १५ दिनों तक पुत्र के साथ रहा. यह पहला अवसर था जबकि मैं अपने स्वयं के घर में पत्नी के बगैर और बच्चों के साथ था. पहले काफी बार बच्चे और पत्नी भारत यात्रा पर गए और मैं महीने भर से भी ज्यादह अकेला रहा, लेकिन तब इतनी कमी महसूस नहीं हुई. और हाँ, घर के बाहर तो अकेलापन लिए हुए मैं २०-३० दिनों तक कई बार रहता हूँ, तब मुझे ज़रा भी एकांत प्रतीति नहीं होती.

शायद यह उम्र के कारण हो या फिर अपने ही घर में बच्चे के साथ उसको सम्हालते हुए रहने से. या यह भी हो सकता है कि व्यवसाय का तनाव जीवन साथी के संग हल्का होने की चाहत बढ़ा देता हो. जैसे भी हो, इस बार कमी खली बहुत. आशा रखता हूँ कि शीघ्र ही हिम्मत बढ़ जाए और मैं एकाकीपन का आदि हो जाऊं, क्यूंकि जीवन सत्य तो वही है एवं मेरे अपनी योजनाओं में अगले सारे प्रयास अकेले के ही हैं. एकाकी पीड़ा को सहते हुए जीवन निर्बाध गति से बढ़ता जाए यही प्रयत्नशील रहने की कामना के साथ, आज बस.